क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी साधारण-सी चीज़ के सामने ठहर गए हों, अँधेरे में टिमटिमाती एक छोटी-सी लौ, जो हर झिलमिलाहट के साथ जैसे कुछ कह रही हो, खिड़की पर गिरती बारिश की बूँदें, या सांझ के समय अचानक नारंगी हो उठा आकाश और भीतर कुछ हल्का-सा बदल गया हो? जिसका कोई विशिष्ट नाम न हो और न कोई अर्थ, फिर भी वह क्षण आपको छू गया। वह शांत, अनकहा सा स्पर्श, शायद वहीं से कला शुरू होती है। हमेशा किसी कैनवास या मंच पर नहीं, बल्कि उस अदृश्य पल में, जहाँ कोई दृश्य और उसे अनुभव करने वाला मन आपस में मिलते हैं। कला केवल वह नहीं जो हम देखते हैं, बल्कि वह है जो हमारे भीतर घटती है। और यदि हर व्यक्ति के भीतर कला अलग रूप में जीवित होती है, तो प्रश्न स्वाभाविक है कि कला वास्तव में किसकी है? उसे रचने वाले की, या उसे महसूस करने वाले की?
कला रचने वाले के लिए वह अत्यंत व्यक्तिगत होती हे क्योंकि उसमें उसके अनुभवों की छाप होती हे, और उसकी पीड़ा, उसका आनंद, उसका विरोध, उसकी सोच, सब कुछ कहीं न कहीं दर्ज होता है। हर रचना कहीं न कहीं अपने सृजनकर्ता को दर्शाती है। वह केवल रंग या शब्द नहीं होती, वह किसी के भीतर की दुनिया का विस्तार होती है। लेकिन जैसे ही कला रचयिता के हाथों से निकलकर दुनिया के सामने आती है, कुछ असाधारण घटित होता है। दो लोग एक ही चित्र के सामने खड़े होते हैं, एक की आँखें नम हो जाती हैं, तो दूसरे को कुछ नहीं लगता ओर वही कोई आकर कह देता है, “ये तो मेरा पाँच साल का बच्चा भी बना सकता है”। वही चित्र परंतु सच बिल्कुल अलग-अलग और शायद तीनों ही अपने-अपने स्थान पर सच हैं।
कलाकार बस एक चिंगारी जगाता है, पर वह आग कितने दूर तक फैलेगी यह कहीं न कहीं अनुभव करने वाला तय करता है। कला कोई एकतरफ़ा संवाद नहीं है, बल्कि वह एक मौन वार्तालाप है, जैसे आशय और व्याख्या के बीच चलने वाला संवाद। कलाकार अपनी भावनाएँ, अपने विचार, और अपना संघर्ष अपनी रचना में घोल देता है, लेकिन अर्थ वहीं समाप्त नहीं हो जाता। वह आगे बढ़ता है, हर उस मन में नया रूप लेता है जो उसे देखता या सुनता है। और शायद सबसे रोचक तथ्य यह है कि सृजनकर्ता स्वयं भी पहले एक अनुभव करने वाला होता है। समाज, संस्कृति और अपने समय से प्रभावित, उसकी कला उसी दुनिया का प्रतिबिंब होती है जिसे उसने महसूस किया है।
इसके साथ-साथ समय भी अपनी शांत और अनदेखी भूमिका निभाता है। वैन गॉग को उनके जीवनकाल में नज़रअंदाज़ किया गया था पर आज वही चित्र लाखों लोगों को छू जाता हैं। सदियों पुरानी कोई कविता आज भी अलग अर्थ लेकर सामने आ सकती है। कला शायद वैसी ही रहती है, पर हम बदलते रहते हैं। और जब हम बदलते हैं, तो उसके अर्थ भी हमारे साथ बदलते जाते हैं।
आखिरकार कला को कौन परिभाषित करता हे, सृजक या बोधक? शायद कोई नहीं, इनमे से किसी एक को चुनना मुश्किल है पर कला शायद उसी जगह जीवित रहती है जहाँ अभिव्यक्ति और अनुभव एक-दूसरे से मिलते हैं। कला केवल रचने वाले को नहीं, और न ही केवल देखने वाले को परिभाषित करती है। वह उस अदृश्य धागे को जन्म देती है जो दोनों को जोड़ता है। वही संबंध, वही संवाद, शायद उसकी असली पहचान है। कला किसी की संपत्ति नहीं होती, उसे बस अनुभव किया जाता है। और शायद, यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
-प्रीती सागु

Bohot badhiya 👍👍
ReplyDelete👌👌
ReplyDelete"शब्दों का जादू! कला की परिभाषा को इतने सरल और गहरे ढंग से समझाने के लिए शुक्रिया। 👌
ReplyDelete"कला एक 'मौन वार्तालाप' है—यह बात दिल को छू गई। बहुत ही सुंदर और विचारशील लेख! ✨"
ReplyDelete👍👍
ReplyDeleteGreat 👍
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