भारत की स्वतंत्रता में अनेक वीरों ने अपना लहू अर्पण किया है। आज, हमारे वीरों की अमर साँसों से ही हमारे भारत देश का झंडा गर्व से लहरा रहा है। इन्हीं में से एक महारथी भारत माँ के लिए अपना प्रेम दर्शाने हेतु, वह लिखते है -
*तुजसाठी जनन ते मरण,*
*तुजविण जनन ते मरण |*
*तुज सकल चराचर शरण*
*स्वतंत्रते भगवती ||*
यह महानुभाव इन चंद पंक्तियों में देशभक्त के जीवन का सार बताते है। वह भारत माता को संबोधन करते हुए यह कहते हैं कि भारत माँ के लिए मरना, अर्थात् हमेशा के लिए अमर हो जाना है। इस महाकवि ने भारत भूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने विचारों से भारतवासियों को जागृत किया। ऐसे महान विचारों के स्वामी थे स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी।
आज से १४३ साल पहले भागूर गाँव में एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में सावरकरजी का जन्म हुआ। विनायक सावरकर से ‘स्वतंत्र्यवीर सावरकर’ तक का उनका प्रवास यहाँ से शुरू हुआ था, तथा इस प्रवास में उनके मार्गदर्शक बने उनके पिता, दामोदर सावरकर जी। सावरकर जी की माता, राधाबाई सावरकर का सावरकर जी के जन्म के ९ साल बाद ही कॉलेरा महामारी के कारण देहावसान हो गया। राधाबाई की मृत्यु के उपरांत दामोदर पंत ने ही उनके ४ बच्चों की परवरिश करने की ज़िम्मेदारी उठाई। दामोदर पंत स्वयं वेद, उपनिषद के ज्ञाता थे, और उससे बढ़कर एक देशभक्त थे। अपने बच्चों में देशभक्ति और हिंदुस्तान के प्रति प्रेम एवं स्नेह का भाव जागृत करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उनका सपना था कि आगे चलकर उनके बच्चे देश की सेवा हेतु कुछ अच्छा कार्य करें। इसीलिए बचपन से ही उनमें जोश, निडरता, धैर्य तथा सुविचार के बीज बोने के लिए उन्होंने उन्हें महाभारत तथा रामायण के पाठ पढ़ाए। इसके साथ उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की शौर्यगाथाएँ भी सुनाई ताकि बच्चों के मन में देशप्रेम पले और आज़ादी की चिंगारी प्रज्वलित हो उठे। स्वतंत्र्यवीर सावरकर जी के बालपन पर इस सबका अच्छा प्रभाव पड़ा और तभी से उनके मन में स्वतंत्रता का भाव जाग उठा।
जन्म से ही सावरकर जी को काव्यलेखन करने की एक अगम्य सौगात मिली थी। समाज में जागृति फैलाने के लिए उन्होंने कलम को ही अपना शस्त्र बना दिया। ११ वर्ष की आयु तक उनकी देशभक्ति पर कविताएँ कई अखबारों में प्रकाशित होने लगी। यहीं से उनकी ध्येय प्राप्ति का संघर्षमय समय आरंभ हुआ। जब वह विद्यालय में गए, तब उनकी इस देशभक्ति की विचारधारा से उन्होंने उनके सहपाठीयो को भी प्रभावित कर दिया। १८९५ के आस-पास राम मंदिर और बाबरी मस्जिद को लेकर दंगे हुए, इस दौरान हिंदुओं पर अन्याय हुआ, इससे बेचैन होकर १२-१३ वर्ष के युवा वीर सावरकर जी ने अपने साथियों के साथ इन अत्याचारों का विरोध किया। प्रसिद्ध लेखक विक्रम संपत द्वारा सावरकर जी पर लिखित चरित्र ‘सावरकर’ इस पुस्तक में भी इस घटना का प्रमाण मिलता है। १८९७ में चापेकर बंधू को डब्ल्यू. रैंड की हत्या करने के कारण फाँसी की सज़ा सुनाई गई, यह सुन युवा वीर सावरकर जी ने प्रतिज्ञा ली कि इस सज़ा का बदला लेने के लिए वह खुद अंग्रेज़ो का डटकर सामना करेंगे और उन्हें घुटने टेकने पर मजबूर करेंगे।
महाविद्यालय में शिक्षण लेने के कारण सावरकर जी ने १९०२ में पूना के नामवंत महाविद्यालय फ़र्गसन कॉलेज में दाखिला लिया। वहीं उन्होंने एक गुप्त संगठन बनाया, जिसे उन्होंने ‘मित्र मेळा’ नाम दिया, जिसे बाद में ‘अभिनव भारत सोसायटी’ से जाना गया। ७ अगस्त १९०५ में कलकत्ता में छिड़े स्वदेशी आंदोलन को उत्तेजना देने के लिए पूना में दशहरा के समय रावण दहन के साथ विदेशी वस्त्रों का भी दहन किया गया। अभिनव भारत सोसायटी में उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्रों की तस्करी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही, उन्होंने १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम को ‘Sepoy Mutiny’ कहे जाने का खुलकर विरोध किया। ‘इंडिया हाऊस इन लन्दन’ में शिक्षा ग्रहण करते समय वह भारतीयों को अंग्रेजों के खिलाफ जागरूक और संगठित करने का कार्य भी करते रहे। इन सभी गतिविधियों के कारण अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें कारावास की सज़ा सुनाई। ८ जुलाई १९१० में जब उन्हें ब्रिटिश जेल से मार्सेल, जहाज़ से भेजा गया तब उन्होंने जहाज़ के शौचालय में से स्वयं को मुक्त किया, किंतु उन्हें फ्रांस में पकड़ा गया। इसी वजह से उन्हें काला पानी की सज़ा सुनाई गई। सावरकर जी पर वहाँ बहुत अत्याचार किए गए। उन्हें मारा गया, खाने - पीने से वंचित रखा गया, किंतु अपने देश के लिए उन्होंने यह सब सहा। जेल की दीवारों पर सुंदर काव्य तथा गद्य की रचना कर भारत माता के प्रति अपने प्रेम को दर्शाया। ‘माझी जन्मठेप’ यह आत्मचरित्र, ‘सागरा प्राण तळमळला’ यह गीत एवं ‘The Indian War of Independence, 1857’ यह राष्ट्रवादी लेख, आदि का लेखन जेल में किए। इस लेखन दौरान उन्होंने अपना छद्म नाम ‘चित्रगुप्त’ रखा, ताकि अंग्रेज़ो को उनके इस लेखन की भनक न लगे। १० वर्षों तक वहाँ रहने के बाद उन्हें रत्नागिरी जेल में भेजा गया। १९२४ में उन्हें जेल से रिहा किया गया, लेकिन उन पर अधिकारियों की निगरानी थी। इसी दौरान सावरकर जी ने भारतवासियों में मतभेद की भावना मिटाने का निश्चय कीया।
१९३१ में रत्नागिरी में पतित पावन मंदिर की स्थापना हुई, परंतु मंदिर में अछूतों का प्रवेश निषेध माना गया। इस जातिभेद के खिलाफ सावरकर जी ने आवज़ उठाई। उन्होंने पंडितों तथा समाज में जातिभेद की संकीर्ण सोच का विरोध किया तथा सभी वर्गों और जातियों के लोगों के लिए मंदिर के द्वार खुलवाकर सामाजिक समानता का संदेश दिया। यह भारत का पहला मंदिर था जो दलित, लोहार, सोनार, आदि सब जाती के लोगों के लिए खुला था। स्वयं को देश की सेवा में समर्पित करने के बाद, १ फरवरी १९६६ में सावरकर जी ने अन्न - जल का त्याग किया और आत्मार्पण के मार्ग को स्वीकारा। हमारे भारत देश के इस स्वातंत्र्यवीर को उनके जन्मदिवस पर शत-शत नमन।
-आर्यन पाध्ये

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