जब इंसान ने पहली बार प्रकृति को देखा, तो उसने उसमें अपना घर पाया, पेड़ों की छाया में विश्राम, नदियों के जल में जीवन और पहाड़ों की ऊँचाइयों में प्रेरणा। लेकिन समय के साथ यह घर बाज़ार में बदल गया। प्रकृति, जो कभी हमारी संस्कृति और आस्था का केंद्र थी, आज उपभोग और लाभ का साधन बन चुकी है। सह-अस्तित्व की भावना, जहाँ हम प्रकृति के साथ संतुलन में जीते थे, अब धीरे-धीरे उपभोक्तावादी दृष्टिकोण में बदल रही है। यही बदलाव हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम प्रकृति के संरक्षक हैं या उसके व्यापारी ?
प्रकृति का व्यवसायीकरण उस बदलाव को दर्शाता है जिसमें प्रकृति को एक साझा, जीवित प्रणाली के रूप में देखने के बजाय उसे बाज़ार में खरीदे-बेचे जाने योग्य वस्तु के रूप में देखा जाने लगा है। पारंपरिक रूप से कई संस्कृतियाँ प्रकृति को उसकी आंतरिक, आध्यात्मिक और जीवन-सहायक भूमिका के लिए महत्व देते थे। इन समाजों में मनुष्य प्रकृति को अपना रिश्तेदार या साझा संपत्ति मानते थे, न कि वस्तु। लेकिन वैश्विक पूँजीवाद और बाज़ार विस्तार के साथ प्रकृति को लगातार वस्तु में बदला जा रहा है। उसे विनिमेय इकाइयों में परिवर्तित कर आर्थिक मूल्य दिया जा रहा है। जिससे गंभीर पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभाव उत्पन्न हो रहे है। प्रकृति का व्यवसायीकरण प्राकृतिक इकाइयों और सेवाओं को मौद्रिक मूल्य देने से जुड़ा है, जैसे वन, जल और जैव विविधता। ये वे चीज़ें हैं जो पहले स्वतंत्र रूप से उपलब्ध थी और सांस्कृतिक या पारंपरिक रूप से मूल्यवान थी, परंतु अब इन्हें बाज़ार में निर्मित वस्तुओं की तरह खरीदा-बेचा जा सकता है।
प्रकृति का व्यवसायीकरण मुख्यतः तीन तरीकों से होता है : पहला, कार्बन क्रेडिट, जैव विविधता क्रेडिट और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बाज़ार उपकरण बनाकर उन्हें आर्थिक मूल्य देना; दूसरा, ईको-टूरिज़्म और मनोरंजनात्मक गतिविधियों के माध्यम से प्राकृतिक परिदृश्यों को संकुल कर अनुभव के रूप में बेचना; और तीसरा, पर्यावरणीय ऑफ़सेट और बैंकिंग, जहाँ एक स्थान पर प्रकृति को हुए नुकसान की भरपाई दूसरी जगह संरक्षण करके की जाती है।
पारंपरिक समाज केवल आवश्यकता अनुसार संसाधनों का उपयोग करते थे, वनों का प्रबंधन अनुष्ठानों और नियमों से करते थे और पारिस्थितिक संतुलन का सम्मान करते थे। आधुनिक आर्थिक प्रणालियाँ विकास, लाभ और संचय को प्राथमिकता देती हैं। प्रकृति को बाज़ार में लाया गया है जहाँ उसका उपभोग या शोषण अल्पकालिक लाभ के लिए होता है, दीर्घकालिक पारिस्थितिक लागतों को अनदेखा करते हुए।
आजकल प्राकृतिक स्थल जो कभी स्थानीय पारिस्थितिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा थे, अब बड़े ईको-टूरिज़्म आकर्षण बन गए हैं। सतत पर्यटन संरक्षण के लिए धन उपलब्ध कर सकता है, लेकिन यह प्रकृति को एक आर्थिक वस्तु और भुगतान आधारित अनुभव में परिवर्तित कर देता है। भारत में आदिवासी समुदायों के लिए जंगल, जीवन और संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब ये जंगल लकड़ी, खनिज और व्यावसायिक खेती के लिए बड़े पैमाने पर काटे जा रहे हैं। इससे पारंपरिक सहअस्तित्व की संस्कृति टूट रही है।
प्रकृति को महत्व देना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उसका व्यवसायीकरण कई स्तरों पर नुकसान पहुँचाता है। जब प्रकृति को केवल पैसे के लिए आँका जाता है, तो उसका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व खो जाता है। बाज़ार अक्सर पारिस्थितिकी तंत्र के असली मूल्य को नहीं समझ पाते, जिससे अतिशोषण और कुप्रबंधन होता है। साथ ही, स्थानीय भूमि संरक्षकों और आदिवासी समुदायों को बाहर कर असमानताएँ बढ़ती हैं। इसके अलावा, व्यवसायीकरण से दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ सकता है, जैव विविधता घट सकती है और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर गरीब समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। यह प्रक्रिया जलवायु परिवर्तन को भी तेज कर सकती है, क्योंकि प्रकृति को वस्तु मानकर उसका संरक्षण कमज़ोर पड़ जाता है। इसलिए यह मुद्दा नैतिक, सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रकृति का व्यवसायीकरण सहअस्तित्व से उपभोग की ओर बदलाव को दर्शाता है। पारिस्थितिक तंत्रों के साथ जीने और उनका सम्मान करने से लेकर उन्हें मापने, कीमत लगाने और व्यापार करने तक। यह बदलाव नैतिक, पारिस्थितिक और सामाजिक प्रश्न उठाता है, कि हम प्रकृति को कैसे महत्व देते हैं और क्या बाज़ार वास्तव में उसकी रक्षा कर सकते हैं। प्रकृति का व्यावसायीकरण हमें यह चेतावनी देता है कि यदि हमने अपने दृष्टिकोण को नहीं बदला, तो आने वाली पीढ़ियों को विरासत में केवल संकट ही मिलेगा। प्रकृति को साधन नहीं, साथी मानें, तभी जीवन सुरक्षित और स्थायी रहेगा।
- अनया रामतिर्थ




