Monday, May 18, 2026

दैनंदिनी के पन्ने

 

सुबह के सात बजे थे, और हमेशा की तरह सानिया का फोन ज़ोरों-जोरों से कर्कश ध्वनि से उसे उठाने का पूरा प्रयास कर रहा था। सानिया का हाथ, सहज रूप से उसे बंद कर ही रहा था, कि तभी नसीब से सानिया को समझ आया की उसके फोन का बजना कोई अलार्म नहीं था, परंतु रिंगटोन थी। चौंककर सानिया ने आँख खोली और देखा कि उसके इंटर्नशिप से उसके बॉस का फोन था। सानिया झट से उठी और फोन उठाया। दूसरी ओर से बॉस की आवाज आयी “सानिया, एक जरूरी काम था। हमारे तत्वज्ञान विभाग को आज मुख्य सभा में एक लेख प्रस्तुत करना है। लेकिन हमारी मुख्य लेखिका आज छुट्टी पर है, तो तुम्हें लेख अभी ग्यारह बजे तक भेजना होगा। और हाँ, इस बार हमारे विभाग का लेख पत्रिका में प्रकाशित होने के लिए चुना जाना ही चाहिए।” सानिया बोली “सर, पर अभी इतने कम समय में लेख कैसे पूरा होगा? और मुझे परीक्षा की पढाई–”

“सानिया, अगर तुम्हें इस लेखन के क्षेत्र में आना है तो बेहतर है कि तुम इस से पहले ही परिचित हो जाओ, बहाने बनाना बंद करो। ग्यारह बजे तक लेख ईमेल कर देना। और हाँ, किस विषय पर लिखना है उसकी रचनात्मक स्वतंत्रता भी मैं तुम्हें देता हूँ।” जैसे ही कॉल खत्म हुआ, सानिया ने गुस्से में अपना फोन बिस्तर पर फेंक दिया। २१ वर्ष की सानिया अभी कला शाखा, हिंदी विभाग के आखिरी वर्ष में थी, और साथ ही वह प्रचलित पत्रिका “सभासंवाद” कंपनी में लेखक के तौर पर प्रशिक्षण ले रही थी। अर्धकालिक प्रशिक्षण के हिसाब से उसकी कंपनी उसे बहुत ज्यादा काम दे रही थी, और वेतन? बहुत ही कम। पिछले हफ़्ते से तो उसे कोई दूसरा कार्य करने का समय ही नहीं मिला। एक लेख के बाद दूसरा, ऐसा लगता है कि कोल्हू के बैल की तरह वह उसी चक्र में घूम रही है। ऊपर से उसमें अनेक बदलाव करवाना, और फिर मुख्य सभा में वह पत्रिका के लिए चुना न गया तो डाँट भी सानिया को ही पड़ती थी। सानिया सिर्फ प्रशिक्षण के बोझ से ही नहीं झूज रही थी, परंतु उसको अपनी अंतिम परीक्षा की तैयारी भी करनी थी, जिसके लिए केवल ४ दिन बचे थे। इस उद्योग में टिके रहना आसान नहीं था, यहाँ बहुत कड़ी प्रतिस्पर्धा थी।

“इतना बोझ है कि अब मेरा दम घुटने लगा है।” इस विचार से सानिया कंपनी जाने के लिए तैयार होने लगी। घर से निकलते समय उसका चेहरा उदास और चिंतित था। “अब में किस विषय पर लेख लिखूं? इतनी सीमित अवधि में लेख कैसे लिख पाऊंगी मैं? और ऊपर से पढ़ाई भी कितनी ज्यादा है! हर तरफ़ से इतना दबाव है कि साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है।” इन्हीं विचारों के साथ सानिया कंपनी जाने के लिए बस स्टॉप पर खड़ी थी। उसी समय एक छोटी सी ५-६ वर्ष की बच्ची स्कूल की गणवेश पहने उसकी माँ के साथ बस स्टॉप पर आयी। 

“माँ! सुनाओ ना कहानी!”

“बेटा, तुम देख रही हो ना, मैं काम कर रही हूँ। हम रात को वह तुम्हारे पसंदीदा पुस्तक से कहानी पढ़ेंगे, ठींक हैं?” यह कहकर उसकी माँ फिर से अपने फोन में व्यस्त हो गई। यह देखकर सानिया को अचानक से अपने बचपन का एक किस्सा याद आया। 

सानिया, करीब ८ वर्ष की, भागते हुए उसकी माँ के कमरे में गयी। “माँ! मैंने भी आप की तरह एक कहानी बनाई है! आप सुनोगे?” 

“अरे वाह! सुनाओ!” 

“एक राजा था जो अपनी राजकुमारी से बहुत प्यार करता था।…..” अपने नन्हे से शब्दों में, नन्ही सी सानिया अपनी माँ को पूरे उत्साह से कहानी सुनाने लगी, और माँ बिस्तर लगाते हुए उस कहानी को दिलचस्पी से सुनते गयी। कहानी सुनने के बाद माँ बोली “क्या बात है! कितनी प्यारी कहानी है बेटा।” 

“सच में? माँ, तो फिर, अब मैं भी अपनी सारी कहानियां आपकी तरह एक दैनंदिनी में लिखूंगी!” 

“हाँ बेटा, जरूर लिखना। पर हाँ, सिर्फ पन्नों में मत रहने देना, बाद में उसे प्रकाशित जरूर करना।” 

“हाँ, और मैंने तय कर लिया है कि मैं बड़ी होकर एक लेखिका बनूँगी, और बहुत लिखूंगी। केवल लिखते ही रहूंगी।”

“हाँ, हाँ, बन जाना। पर अभी जल्दी सो जाओ।” 

“ठीक है। पर माँ, आपने अपनी कहानियों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित क्यों नहीं की?” सानिया को बिस्तर पर सुलाके और उसपर कंबल ओढ़ते हुए माँ ने कहाँ “अरे बेटा, मेरे दैनंदिनी के अंदर कितनी कम कहानियां हैं। इतनी कम कहानियों को भला कौन प्रकाशित करेगा?”

“तो आप और कहानियां क्यों नहीं लिखते?” 

“बेटा, समय कहाँ है? तुम्हारे इतने प्रश्नों का उत्तर देते-देते ही समय निकल जाता है मेरा।” माँ ने हसते हुए प्यार से सानिया के गाल खींचे।  

“क्या माँ! मैं जब बड़ी हो जाउंगी, तब में दूसरा कोई काम नहीं करुँगी, बस लिखूंगी।”

“अच्छा, ठीक है। चलो अभी, सो जाओ” ऐसा कहके कमरे की लाइट बंद हो गयी, और २१ वर्षीय सानिया बस के आवाज से होश में आयी। परंतु अब सब कुछ अलग लग रहा था। सानिया के चेहरे से चिंता के भाव मिट चुके थे और उसकी जगह एक गहरी मुस्कान खिल उठी थी। उसे अपने लेख का विषय भी मिल चुका था। जैसे ही सानिया कार्यालय पहुँची, उसने तुरंत अपना लैपटॉप खोला, और वह लिखने लगी। बिना रुके, सिर्फ लिखते गयी… 

“हम अक्सर जीवन की भाग-दौड़ में, बाह्य प्रतिफल के पीछे भागने में, आंतरिक प्रतिफल को भूल जाते है। हम जब छोटे होते है, तो बड़े होकर कुछ बनने का स्वप्न देखते है। पर जब हम वह सपना पूरा कर लेते है, तब उसे पूर्ण रूप से जीने के अलावा, दूसरे लक्ष्य बना लेते हैं। जैसे इतना वेतन, इतनी संपत्ति, और ऐसे भौतिक सुखों की ओर अग्रसर हो जाते हैं। और अपनी वास्तविक इच्छाओं को स्मरण में न रखकर, हम उन्हीं सपनों में दोष ढूंढने लगते हैं। हम बचपन में जो करना चाहते थे, पैसों के लिए नहीं, बल्कि स्वानंद के लिए, आज वही काम करते वक़्त हमें तनाव महसूस होता हैं। क्यों? क्योंकि हम उस काम से मिलनेवाले आनंद को नहीं, पर उससे मिलने वाले प्रतिफल कि तरफ देखते हैं। हमें कृतज्ञ होना चाहिए, कि हम वह स्वप्न हकीकत में बदलते हुए देख पा रहे हैं, क्योंकि ज्यादा लोगों को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं होता।”

लिखते हुए सानिया के चेहरे पर मुस्कुराहट थी, और प्रसन्नता से उसकी आँखें नम थी। उसे अब किसी चीज़ की चिंता नहीं थी। उसके लेख को मंजूरी मिलेगी की नहीं, उसका वेतन बढ़ेगा की नहीं, वह परीक्षा में उत्तीर्ण होगी की नहीं, इन सब प्रश्नों से अब वह निश्चिन्त थी, क्योंकि वह अपना स्वप्न जी रही थी। उसका स्वप्न यह लेखन की प्रक्रिया थी, न की कोई भौतिक प्रतिफल। सानिया को अधिक काम जरूर था, परंतु यह कार्य ही उसका स्वप्न भी था, उसका जीवन था। इसीलिए सानिया लिखती गयी.. 

“यह स्वप्न सिर्फ व्यवसाय, कार्य, इन्हीं के बारे में नहीं है, पर हर उस चीज़ के बारें में है जो हम आज कर पा रहे हैं। जैसे अच्छे मित्र बनाना, नेक काम करना, अपनी एक पहचान होना, खुदका एक विचार बनाना, यह सब एक विशेषाधिकार है, विलासिता हैं एवं बीते स्वयं का एक स्वप्न हैं, जिसके लिए हमें कृतज्ञ होना चाहिए। कदाचित, आनंद स्वप्न हासिल करने से जुड़ा ही नहीं है, बल्कि उन सपनों को जीने से जुड़ा है, और शायद आनंद सपनों से ज्यादा हमारे दृष्टिकोण से जुड़ा हैं।” 

इस प्रकार सानिया लिखती गयी,‌ और अपने बचपन का स्वप्न साकार करती गयी…


-श्रावणी राजगुरु 

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