Thursday, October 15, 2026

ज्ञान के सागर में सीपियाँ: पठन से प्रबोधन तक

 


"किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं... 

ज़बाँ पर जायका आता था जो सफ़ा पलटने का, अब उँगली क्लिक करने से बस एक झपकी गुजरती है।"

अपनी कविता 'किताबें' में गुलज़ार जी बड़ी सुंदरता से बदलते समय की एक समस्या की ओर, "इन्स्टंट इन्फॉर्मेशन" यानी "त्वरित जानकारी" की प्राप्ति के कारण कम होती हुई पुस्तकें पढ़ने की आदत की ओर संकेत करते हैं | लोग आजकल एक क्लिक से किसी भी विषय के बारे में जानकारी पाकर बिना उसे पूरी तरह समझे उसे स्वीकार कर लेते हैं|

लेकिन यह आधी-अधूरी जानकारी हमें पूरा चित्र नहीं दिखा पाती। इसके विपरीत पढ़ने की प्रक्रिया हमें अलग-अलग संदर्भों के माध्यम से विविध दृष्टिकोण समझाकर अपना स्वतंत्र व सूचित मत बनाने का अवसर देती है। यह हमें किसी एक दृष्टिकोण तक सीमित न रखकर समकालीन विचारों के भेद दिखाती है। इस प्रकार ये केवल अलग-अलग दृष्टिकोण को स्वीकार करना नहीं ,बल्कि पूर्व स्थापित संकल्पनाओं पर सवाल करना भी सिखाती हैं।

वाचन के इस महत्त्व को लोगों तक पहुँचाने के लिए डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी के जन्मदिन के अवसर पर प्रतिवर्ष १५ अक्टूबर को "वाचन प्रेरणा दिवस" के रूप में मनाया जाता है| डॉ. कलाम जी को पुस्तकों से विशेष लगाव था, उनका मानना था कि बेहतरीन किताबें दिमाग के लिए प्रकाशस्तंभ हैं, जो जीवन के सफर में हमारा मार्ग रोशन करती हैं| इसी उद्देश्य से सन २०१५ से यह दिन विद्यार्थियों और समाज में वाचन की संस्कृति को प्रोत्साहित करने हेतु मनाया जाता है।

वाचन का महत्त्व सिर्फ आधुनिक काल तक सीमित नहीं है। प्राचीन भारतीय सिद्धांतों के अनुसार पाठक केवल उपभोक्ता नहीं है, उसे रचनाकार या सृष्टिकर्ता के बराबर का दर्जा दिया गया है| आनंदवर्धन जैसे महान विचारकों का मानना था कि कवि तो केवल एक बीज बोता है, जिसका सुंदर बगीचे में रूपांतर करने का कार्य पाठक की कल्पना करती है। यह भी माना जाता था कि जब आप किसी रचना में पूरी तरह डूब जाते हो तब आपका अहंकार लुप्त होकर आप ब्रह्मानंद सहोदर ( आध्यात्मिक आनंद जैसा सुख) की अनुभूति कर पाते हो।

पुस्तकों से मिलने वाली यह अनुभूति पाने के लिए पुस्तकों तक हमारी पहुँच होना भी उतना ही आवश्यक है। डॉ. कलाम कहते थे कि एक पुस्तकालय किसी भी राष्ट्र की रीढ़ के समान होता है। यह कोई विलासिता नहीं बल्कि जीवन की अनिवार्यता है| लेकिन आज के समय में वाचकों की घटती संख्या के कारण हमारे देश में पुस्तकालयों की संख्या भी घटती जा रही है, जिसका एक कारण शायद वाचन से मिलने वाले वास्तविक आनंद से अनजान रह जाने वाला आज का समाज है।

पुस्तकें हर व्यक्ति के लिए कुछ ऐसा लाती हैं जो उसके विचारों और अनुभवों से जुड़ जाता है।

यह ज्ञान के महासागर के समान होती हैं और हमारा ध्येय उस पूरे सागर को समा लेना नहीं बल्कि हमारे दिल को भाने वाली अनोखी सीपियों और शंखों को इकट्ठा करना है। क्योंकि पठन केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसी अनुभूति है, जो खयालों को नई उड़ान देती है और आपके मन को छू जाती है।

संस्कृत भाषा में एक श्लोक है :

पुस्तकस्था तु या विद्या, परहस्तगतं धनम्।

कार्यकाले समुत्पन्ने, न सा विद्या न तद् धनम्॥

इसका सुंदर प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि पुस्तकों में सीमित ज्ञान तब तक हमारे लिए निष्क्रिय हैं, जब तक हम उसे पढ़ते नहीं है। पुस्तकें ज्ञान को अपने भीतर सँजोए हमारा इंतज़ार कर रही हैं, आवश्यकता केवल उन्हें खोलने, पढ़ने और उस ज्ञान को अपना बनाने की है।


- श्रीला कुलकर्णी

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